«अरे, अब अक्ल आई क्या?»
यांग ज़िज़ांग को आदिवासियों से कोई शिकायत नहीं थी।
«ऊ-ओ-ऊ-ओ।» सारे शरीर के बाल जल चुके मुखिया ज़मीन पर लेटकर आगे खिसका।
«अफ़सोस, मैं ड्रैगन राजा नहीं हूँ, तुम्हारी आग नहीं बुझा सकता।»
इन आदिवासियों की नज़र में, यांग ज़िज़ांग बेशक इस सबका जड़-मूल कारण था।
यांग ज़िज़ांग की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया न देख, दो हट्टे-कट्टे आदिवासी उठ खड़े हुए।
उन्होंने पत्थर उठाकर ज़मीन पर पड़े मुखिया को मार डालने की ठानी।
सब आदिवासी ज़मीन पर लेटकर साथ-साथ चिल्लाने लगे।
ये आदिवासी समझ रहे थे कि टोली के मुखिया ने इस बयान से परे महान हस्ती का ग़ुस्सा जगा दिया है, शायद उसे मार डालने से ही इसका ग़ुस्सा शांत हो।
«रुको!»
आदिवासी उसकी बात कहाँ समझते थे, बड़ा पत्थर हाथ से छूट गया, मुखिया ने क़िस्मत को स्वीकार-सा करके ज़मीन पर दुबककर कोई विरोध न किया।
[प्रक्षेप पथ समायोजन!]
धम-धम!
दोनों चट्टानें अजीब तरीक़े से मुखिया के सिर के दोनों ओर जा गिरीं।
मुखिया की आँखों में हैरत छा गई, उसे लगा यह अनोखी हस्ती चट्टानों का रास्ता बदल सकती है।
मारने वाले दोनों आदिवासियों के हाथ काँपने लगे, उनकी हिम्मत न हुई कि दोबारा पत्थर उठाएँ।
यांग ज़िज़ांग ने समायोजन क्षमता की वजह यही सोचकर की थी कि इन आदिवासियों को अपनी ताक़त दिखाकर डराए, ताकि वे दोबारा आँखें न दिखाएँ।
«ठीक है, मुझे पत्थर मारने वाले की कोई परवाह नहीं, जिसे चोट लगी है उसे यहाँ लाओ।»
यांग ज़िज़ांग ने इधर-उधर देखा, जिन आदिवासियों को जलन हुई थी, उनमें से ज़्यादातर की चोट गंभीर नहीं थी, बालों के कारण आग ज़्यादा न लगी थी। सबसे ज़्यादा जला मुखिया था, जो यांग ज़िज़ांग के सबसे क़रीब था।
बाक़ी कुछ नाबालिग़ आदिवासी कमोबेश आग की चपेट में आए थे, उनमें एक ख़ासतौर पर बुरी तरह जला था, उसका पूरा बायाँ बाज़ू जलकर काला पड़ गया था, दर्द से बेहोश पड़ा था।
«जले का इलाज… मुझे नहीं आता।» यांग ज़िज़ांग थोड़ी देर चुप रहा।
वह एक-एक करके ज़ख़्मी आदिवासियों को थोड़ी दूर बहती नदी तक ले गया, उनके जले पर पानी डालकर ठंडा किया, और उन्हें पानी पिलाया। जहाँ तक हो सका, मदद की।
इंसानों के «पूर्वजों» को ऐसी दुनिया में मुश्किल से जीते देख, यांग ज़िज़ांग का दिल भारी हो गया।
«यह सिर्फ़ स्वप्न है, मेरे जाने के बाद, तुम्हें राहत मिलेगी।»
वह मुड़कर चल दिया, ख़ुद से बुदबुदाता हुआ।
दस साल बाद।
यांग ज़िज़ांग एक उभरी ऊँची चट्टान पर खड़ा, गंभीर भाव से दूर क्षितिज को ताक रहा था।
वह दो हज़ार किलोमीटर के दायरे की हर इंच ज़मीन छान चुका था, लेकिन कोई प्रागैतिहासिक सभ्यता का अवशेष न पाया।
इसलिए वह और दूर जाने का इरादा कर चुका था।
शायद महाद्वीप के दूसरे छोर पर कोई और सभ्यता या सभ्यता के अवशेष हों।
यांग ज़िज़ांग ने सिर झुकाकर अपना हाथ और हाथ के चकमक पत्थर देखे।
हालाँकि प्रवेश के वक़्त जैसे ही थे, लेकिन पूरे दस साल में, त्वरण क्षमता के बावजूद, फिर भी लगभग दो साल वास्तविक रूप से गुज़ारे।
«भले यह स्वप्न है, लेकिन तुम लोगों के लिए दुख-सुख तो है ही।»
जाने से पहले, यांग ज़िज़ांग कुछ साल पहले सबसे पहले मिले उस छोटे क़बीले में वापस जाना चाहता था, देखना चाहता था कि वे अब भी वहाँ हैं या नहीं।
[मैं समय त्वरण करके आधे महीने बाद जाना चाहता हूँ।]
[मैंने 15R ख़र्च किया।]
लंबी बर्छी टेकते यांग ज़िज़ांग कुछ घने हुए जंगल से निकला। अभी-अभी बारिश हुई थी, आदिवासी दूर चट्टान की खाइयों में छुपकर अपने बाल सँवार रहे थे, या लकड़ी के हथौड़ों से पत्थर तोड़ रहे थे।
वे अपेक्षाकृत सुविधाजनक पत्थर के औज़ार बना रहे थे।
अचानक, ये लोग बारी-बारी से चिल्लाने लगे, दूर की आकृति पर दाँत दिखाने लगे।
लेकिन तुरंत एक आवाज़ ने उन्हें दबा दिया।
थोड़ा बूढ़ा-सा दिखने लगा हट्टा-कट्टा आदिवासी खड़ा हुआ, हिचकिचाकर सिर उठाकर यांग ज़िज़ांग को देखा।
«ऊँ।»
«ऊँ, ऊँ-ऊँ!»
कई आदिवासी बाँहें लटकाए इस सीधे खड़े सिर उठाए आदिवासी के पास उकड़ू बैठे थे।
गहरी-हलकी हो चुकी खाल देखकर, यांग ज़िज़ांग के चेहरे पर मुस्कान आई, साफ़-साफ़ बोला: «श्याओ वू!»
आ वू वाह करके चिल्लाया, लोट-पोट होता गड्ढे से बाहर निकला, पाँव कीचड़ में धँसे, उँगलियों के बीच से कीचड़ की धार बह निकली। यांग ज़िज़ांग मुस्कुराता उसे पास बैठते देखता रहा।
«बहुत दिनों बाद, श्याओ वू।»
यांग ज़िज़ांग ने उसके सिर के तैलीय काले बाल सहलाए, दो साल यहाँ रह चुका यांग ज़िज़ांग को अब इन चीज़ों से घिन नहीं आती थी।
आ वू का अनुसरण करते, दो-तीन अधेड़ या बूढ़े आदिवासी भी दौड़े आए, ये उस पुरानी टोली के अब तक ज़िंदा लोग थे।
इन बहुत बदले चेहरों को देखकर, भले स्वप्न ही सही, यांग ज़िज़ांग का दिल फिर भी भारी हो गया।
उनके लिए, तीस-चालीस साल की उम्र बहुत बूढ़ी होती थी, सत्रह-अठारह का मज़बूत जवान, अब दूसरी पंक्ति में आकर बस्ती में पत्थर घिसने और फल तोड़ने का काम करता था।
«माफ़ करना, मेरी ग़लती है।»
आ वू बेशक उसकी बात नहीं समझता था, बस इतना लगा कि «समझ से परे शख़्स» की आवाज़ में उतार-चढ़ाव, स्पष्टता और विविधता है, बड़ी जादुई है।
आ वू ने जान-बूझकर गोरिल्ले-सा उकड़ू बैठकर यांग ज़िज़ांग का हाथ पकड़ा, उसे पास कहीं ले जाना चाहा।
यांग ज़िज़ांग हैरानी से उसके पीछे चल दिया, सब आदिवासी भी आसपास घेरकर साथ चलने लगे। लगता है आ वू का अब भी कुछ रुतबा था।
थोड़ी देर में यांग ज़िज़ांग इकट्ठी की गई टहनियों के ढेर के पास आया।
यह ढेर जिस तरह जमाया गया था, लगता था जैसे उस वक़्त उसने जो अलाव जलाया था, वैसा ही।
आ वू उम्मीद भरी नज़रों से उसे देख रहा था, उँगली से अपने मुँह और शरीर पर जलने के निशानों की ओर इशारा किया।
«तुम लोग… ठीक है। लेकिन बारिश में भीगी ये लकड़ियाँ नहीं जलेंगी। मेरे साथ आओ, श्याओ वू।»
अगले आधे दिन, यांग ज़िज़ांग सब आदिवासियों को लेकर अपेक्षाकृत सूखी लकड़ियाँ ढूँढ़ने गया, धूप में सतह की नमी सुखाई। फिर सूखी टहनियाँ, सूखी घास और पानी से भीगी घास-लकड़ी ढूँढ़ी, उसने बाद में इनसे आग जलाने की तुलना करनी थी। साथ ही यांग ज़िज़ांग ने एक लौकी-जैसे सख़्त फल को तोड़कर पानी का कटोरा बनाया, नदी से पानी भर लाया।
रास्ते में, नौजवान ने यूँ ही तीर-कमान से रास्ता काटते एक जंगली भैंसे-जैसे जानवर को ढेर कर दिया, आदिवासियों की खाल पर रोंगटे खड़े हो गए।
सब आदिवासियों ने फिर से उसके शरीर पर लटकी उस मुड़ी «लकड़ी» को बेहद डर के साथ देखा।
शाम, लकड़ियों का नया ढेर लगा, पास पानी और हरी घास का दूसरा ढेर रखा गया।
आदिवासियों की उत्सुक नज़रों के बीच, यांग ज़िज़ांग ने जेब से चकमक पत्थर निकाला।
वह उकड़ू बैठा, पहले थोड़ी सूखी घास सामने रखकर चकमक पत्थर बजाए, उड़ती चिनगारियों से आदिवासी डर के मारे चिल्ला उठे।
थोड़ी ही देर में, वह सूखी घास जल उठी।
फिर से आग देखकर, आ वू वग़ैरा छोटे क़बीले के «अधेड़-बूढ़े» आदिवासी ख़ुशी और डर दोनों से भर गए।
वह जल्दी ही बुझ गई।
«ए-इ? या-इ?» सब हैरानी से उसे देखने लगे।
यांग ज़िज़ांग ने हाथ से सूखी और हरी घास का फ़र्क़ समझाया, हरी घास पर चकमक बजाकर दिखाया, चिनगारियाँ उड़ीं मगर आग न लगी, इस बार नाकाम होने पर, उसने फिर सूखी घास जलाई, पल भर में आग लग गई।
«इसे कहते हैं ‘आग जलाना’, यह है ‘सूखा’, यह है ‘गीला’।»
यांग ज़िज़ांग ने कई बार यह उच्चारण दोहराया, नतीजा बिल्कुल भैंस के आगे बीन बजाने जैसा रहा।
यह छोटी आग फिर बुझने को हुई तो यांग ज़िज़ांग ने उसमें नई लकड़ी डाली, वह फिर जल उठी, कुछ छोटे आदिवासियों के चेहरे पर समझ-सी आई।
यांग ज़िज़ांग ने फिर गीली टहनी से दिखाया, उसे जलने में देर लगी।
आग की रोशनी सबके चेहरों पर पड़ रही थी, आ वू गहराई से सोचता उसे देख रहा था।
लेकिन अगले ही पल, छपाक की आवाज़ हुई।
आ वू उछलकर किनारे हुआ, घबराई नज़रों से यांग ज़िज़ांग की हरकत देखने लगा।
उसने पानी के कटोरे से साफ़ पानी आग पर डाल दिया, छोटी आग पल भर में बुझ गई।
«आ-ए-इ?»
यांग ज़िज़ांग ने पानी और आग की ओर इशारा किया, तब उसे समझ आया कि शायद यह महान हस्ती फिर नाराज़ हो गई।
«अँधेरा होने को है, आज रात दावत करते हैं।»
तीर से गिराए जानवर को बेशक फेंका नहीं जा सकता था, यांग ज़िज़ांग ने कमर से आधी बाँह-भर लंबा तेज़ पत्थर का चाकू निकालकर उसे काटा, आदिवासी मुँह बाए देखते रहे।
उन्होंने कभी इतनी सफ़ाई और तेज़ी से मांस कटते नहीं देखा था।
इस रहस्यमयी हस्ती के पास की हर चीज़ अनमोल थी, कई आदिवासियों की आँखों में श्रद्धा छलक आई।
सूरज पूरी तरह डूब गया, आग चटखती जल रही थी।
रात, अनगिनत ख़तरों वाली रात, लंबे ज़माने से हर रात आदिवासियों के लिए एक ऐसी ख़तरनाक दुनिया थी जहाँ कभी भी भेड़िए-बाघ-तेंदुए निकल आते थे और कमज़ोर जानें ले लेते थे।
लेकिन आज की रात अलग थी।
आग की रोशनी पहाड़ी दीवार और दूर जंगल के किनारे तक पड़ रही थी, भुने मांस की ख़ुशबू तो जैसे दिमाग़ का कोई नया हिस्सा ही खोल रही थी, रास्ता भटके कुछ जानवर आग की रोशनी देखते ही दूर भाग खड़े हुए।
आग फिर से देखकर, जो आदिवासी कभी आ वू के साथ बाहर गए थे, उनमें से बचे चंद लोगों को उस साल का भयानक मंज़र याद आया, वे आगे बढ़ने की हिम्मत ही न कर पाए।
«आओ, खाओ।» यांग ज़िज़ांग ने अलाव की ओर इशारा किया।
पीछे बूढ़ों के पीछे बहुत देर से छुपा एक बच्चा-सा बंदर-मानव, मांस की ख़ुशबू पाकर उँगली चूसता आख़िर हिम्मत जुटाकर आगे बढ़ा।
«इसे कहते हैं आग, आ-ग।»
«आ-अ।»
बच्चे ने मुश्किल से अटपटे उच्चारण में कहा।
यह ग़लत उच्चारण सुनकर, यांग ज़िज़ांग ने मुस्कुराकर सिर हिलाया, हाथ से भुनी हुई मांस की सींक उस बच्चे को थमा दी।
आ वू ने लार निगलकर आगे के शख़्स को देखा।
वह हर पल उस साल के शकरकंद के स्वाद को याद करता था।
चारों ओर तरह-तरह की भावनाओं भरी दर्जनों नज़रों के बीच, दुबला-पतला छोटा लड़का लार निगलता, झिझकता यांग ज़िज़ांग की बढ़ी बाँह को देखता, धीरे-धीरे काला छोटा हाथ बढ़ाकर उसे ले लिया।
छोटे लड़के ने सूँघा, दाँतों से मांस का टुकड़ा फाड़ने की कोशिश की, फिर उसकी नज़रें जड़ हो गईं, मानो पत्थर हो गया हो।
आसपास के आदिवासी बेहद तनाव में देख रहे थे, दो-तीन सेकंड बाद, यह बच्चा ऊँ-अ-करके चीख़ा, भेड़िए की तरह मांस मुँह में ठूँस लिया।
अभी चबाया भी न था कि बच्चे की आँखें चमक उठीं, हाँफता हुआ अलाव पर रखे दूसरे मांस के टुकड़ों को घूरने लगा, नज़रें जैसे शिकार पर झपटने को तैयार छोटे बाघ की हों।
उसकी मिसाल देखकर, और लोग आगे बढ़े, उन्होंने मुश्किल से «आग» का उच्चारण किया, जो सफल हुआ, उसे यांग ज़िज़ांग के हाथ का भुना मांस मिला।
थोड़ी ही देर में, सारा आदिम क़बीला उछल पड़ा, मानो बंदरों का छत्ता छेड़ दिया गया हो। और यह «स्वादिष्टता» लाने वाले यांग ज़िज़ांग को सब पूजने लगे, वे और ज़्यादा ऐसी चीज़ें खाने को बेताब थे।
अगले कई दिन, यांग ज़िज़ांग ने इन लोगों को आग जलाना, पत्थर की छुरियाँ घिसना और मांस भूनना सिखाया।
वे बेलों का रस्सी की तरह इस्तेमाल करना जानते थे, बुद्धि के मामले में बिल्कुल लाइलाज न थे, हाथ पकड़कर सिखाने पर, कुछ लोगों ने आख़िर प्रतिभा दिखानी शुरू की, ख़ासकर कुछ बच्चों ने सरल तकनीकें सीख लीं।
«अब से, यह तुम्हारे लिए।»
जाने से पहले, यांग ज़िज़ांग ने दोनों चकमक पत्थर सामने बैठे आ वू की खुरदरी हथेलियों में रख दिए।
सब आदिवासी अविश्वसनीय नज़रों से यह देख रहे थे, इस जादुई शख़्स ने «रात को रोशन करने वाली» चीज़ बनाने का सामान अपने क़बीले वालों को दे दिया।
«आ-वू!» «श्या-आ-हू!» «श्ये-मु।» «ऊँ-वू!»
उन्होंने यांग ज़िज़ांग के उच्चारण की नकल करते हुए चारों ओर नाचते-चिल्लाते गीत गाए।
आ वू ने सिर झुकाकर हाथ के पत्थरों को देखा, उसका दिमाग़ अभी प्रतिक्रिया भी न कर पाया था, जब दोबारा सिर उठाया, तो सामने से वह शख़्स ग़ायब हो चुका था।
कुछ साल बाद, यांग ज़िज़ांग डंडा टेकता, पानी की बोतल लटकाए पथरीले रेगिस्तान में चल रहा था।
यह मिट्टी की बोतल अपने लिए नहीं, यहाँ के कुछ लोगों के लिए थी।
जब भी रेत के बड़े कनखजूरों से भागकर रास्ता भूल चुके लोग मिलते, वह इन जान बचाकर दिशाहीन हुए आदिवासियों को बोतल से कुछ घूँट साफ़ पानी पिलाकर उनकी ताक़त लौटाता।
«यहाँ भी न मूर्ति है, न कोई अवशेष। क्या मैं सचमुच ग़लत स्वप्न में आ गया।»
[मैंने शाही दरबार की ताक़त पर शक किया, कितनी हँसी की बात है।]
यांग ज़िज़ांग ने बेबसी से सिर हिलाया।
जब भी वह जागना चाहता, Moxel ऐसा ही करता।
«न जागने देते हो, न मूर्तियों वाली जगह ले जाते हो। इतना बड़ा स्वप्न-संसार बनाकर क्या करना है, अपनी जादुई ताक़त दिखानी है?»
यांग ज़िज़ांग ने आदतन शिकायत की, न जाने कब से, यह उसकी रोज़ की आदत बन गई थी।
कोई जवाब नहीं, उसने साँस छोड़ी और तपती धूप में बैठकर सामने की मृगतृष्णा देखने लगा।
उसमें नख़लिस्तान और झरने का दृश्य था।
इस पथरीले रेगिस्तान में, ऐसे भ्रम अक्सर दिखते थे, आम तौर पर उन दिशाओं में पानी से पूरी तरह सूख चुकी लाशें मिलती थीं।
जो भी विश्वास करता कि वहाँ खाना-पानी है, प्यासा मरना तय था।
«हाता!»
पास से एक आवाज़ आई।
यांग ज़िज़ांग ने सिर घुमाकर देखा, धूप से लाल हो चुके छोटे गालों वाली एक लड़की थी, उसने सिर पर चौड़ा हरा पत्ता रखा था, शरीर पर भी चौड़े पत्तों के सादा कपड़े पहने थे।
ऐसी तपती धूप में, अगर शरीर ढकने को कुछ न हो, तो धूप से जल जाओगे।
यहाँ के आदिवासियों को, ज़्यादातर यह हुनर आता था।
«तुम हो, इतनी दूर तक मेरा पीछा किया।»
दो दिन पहले एक आदमी को आदिवासी बस्ती में छोड़ते वक़्त, इस जोशीली छोटी बच्ची को देखा था।
इस वक़्त वह बड़ी-बड़ी आँखें फैलाकर यांग ज़िज़ांग के टेके डंडे को देख रही थी, नज़रें मिट्टी की बोतल पर जमी थीं।
«चाहिए?»
यांग ज़िज़ांग ने मुस्कुराकर उसे उतारा, हिलाकर इस बच्ची को दे दिया।
«इ? आ-म?» उसने अपनी ओर इशारा किया।
«तुम्हें दे रहा हूँ, ध्यान से, गिराकर तोड़ना मत, यह बहुत नाज़ुक है।»
बच्ची ने हरा पत्ता किनारे रखा, रेत से बोतल उठाकर हिलाई।
यांग ज़िज़ांग ने लकड़ी का ढक्कन हटाया, तो बच्ची ने झट से एक आँख से अंदर झाँका, देखते-देखते बोतल ऊपर उठाई, मानो सूरज की रोशनी में अंदर और साफ़ देखना चाहती हो।
फिर पहला घूँट उसकी आँख ने पी लिया।
«वाह-वाह!»
बच्ची चकित रह गई।
उसने बचाए गए उस आदमी से सुना था, जिसने सरल शब्दों में यांग ज़िज़ांग का चमत्कार बताया था — उसके पास «पानी» है — तो बच्ची पूरे रास्ते पीछा करती आई।
यह सचमुच सच था।
«आमा, आयोवा।»
बच्ची ने वह जादुई लौकी-नुमा मिट्टी का बर्तन पकड़े हुए, अविश्वास से उसकी ओर इशारा करते हुए कहा।
«तुम बड़ी शालीन हो, नटखट छोटी बच्ची।»
यांग ज़िज़ांग ने उसका सिर सहलाया: «ले जाओ, चाचा ने कहा उपहार है तो उपहार ही है।»
यह कहकर, वह अपना लंबा सीधा शरीर उठाकर आगे बढ़ गया, सामने वाली उसकी बात नहीं समझती थी, लेकिन इशारे से ज़रूर समझ जाएगी।
बच्ची ने बोतल देखी, फिर यांग ज़िज़ांग को देखा, आँखों में न जाने क्या सोच रही थी।
उसने सिर उठाकर कुछ घूँट पानी पिया, फिर यांग ज़िज़ांग की ओर चिल्लाकर कुछ कहा, और कुछ दूर तक पीछे चलती रही, तब हरी पत्ती सिर पर रखे पानी का बर्तन लेकर तेज़ी से भाग गई।
यांग ज़िज़ांग ने मुड़कर उसे जाते देखा, लेकिन ज़्यादा दूर न गई थी कि वह बच्ची, न जाने बहुत उत्तेजित थी या रेत बहुत गर्म और फिसलन भरी थी, गिर पड़ी।
मिट्टी की बोतल कई टुकड़ों में टूट गई, बचा पानी रेत में समाकर तुरंत ग़ायब हो गया।
बच्ची ठिठकी, फिर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।
रेगिस्तान में ऐसा अनोखा पानी का बर्तन पाना, यह पहले कभी न हुआ था, लेकिन ख़ुद ने ही बिगाड़ दिया।
«तुम्हारी क़िस्मत सचमुच ख़राब है।»
दूर खड़े यांग ज़िज़ांग ने हँसते हुए बाँहें बाँधकर उसे देखा, कुछ मिनट बाद भी यह बच्ची रोए जा रही थी।
«आह, तुम्हें शायद पता है कि तुमने क्या बिगाड़ा है।»
वह बच्ची की ओर चल पड़ा।
«वैसे भी मेरे पास काफ़ी समय है, यहीं दोबारा भट्टी जलाता हूँ। इस बार और ख़ूबसूरत बनाऊँगा।»
बच्ची को लेकर उस क़बीले के पास लौटा, फिर बहुत दूर से मिट्टी के बर्तन बनाने लायक चिकनी मिट्टी, लकड़ी और कोयला ढूँढ़कर लाया, और यहीं भट्टी बना दी।
बीस से कुछ ज़्यादा दिनों बाद, कई असफलताओं के बाद, काम चलाने लायक भद्दे बर्तन तैयार हुए।
शुरू-शुरू में बस बच्ची ही उसके पास थी, लेकिन बाद के दिनों में आदिवासी बढ़ते गए।
पहले वे सिर्फ़ उत्सुक थे, या यांग ज़िज़ांग की ताक़त से आकर्षित हुए, क्योंकि वह कुछ पत्थर फेंककर ही उन रेतीले कनखजूरों को भगा सकता था।
लेकिन बाद में वे शांत न रह सके।
तरह-तरह के आकार के मिट्टी के बर्तन सामने आते देख, सबकी नज़रें यांग ज़िज़ांग को एक आम इंसान से संत-महात्मा की तरह देखने लगीं।
«यह लो, खेलने के लिए।»
यांग ज़िज़ांग ने इस भट्टी के मेंढक-नुमा बर्तनों में से एक उठाकर बच्ची को थमा दिया।
«वाह।»
बच्ची की आँखों में तारे चमक रहे थे, आसपास के बच्चे ईर्ष्या से देख रहे थे।
«आताता!» बच्ची ने मेंढक-नुमा बर्तन ऊँचा उठाया, मानो मुकुट उठाए हो।
«आताता आताता!»
फिर उसकी चीज़ छीन ली गई।
यांग ज़िज़ांग उन्हें हँसते-खेलते देखता रहा।
काफ़ी दिनों बाद, इस आदिम क़बीले के आधे से ज़्यादा लोगों ने बर्तनों में पानी भरना सीख लिया।
बेशक दोनों में बहुत फ़र्क़ न था।
इस तरह चालीस से ज़्यादा साल और बीत गए।
यांग ज़िज़ांग न जाने कितनी जगहें घूम चुका था।
वह बहुत पहले के उस चमकीले डाक चिह्न को कोसते-कोसते थक चुका था, साथ ही अब उसे मूर्तियों से कोई उम्मीद नहीं रही, बस उपयोगी कौशल ढूँढ़ते हुए, चलते-चलते वह चीज़ भी ढूँढ़ लेता।
सरकंडे की बरसाती पहने, आसमान में छँटते बादलों को सिर उठाकर देखता यांग ज़िज़ांग कमर पर हाथ रखकर गरदन घुमाने लगा।
उसने पतलून की मोड़ी ऊपर चढ़ाकर पानी में क़दम रखा और आगे छोटी नाव की ओर बढ़ा।
इसे नाव कहना तो दरअसल एक बड़े पेड़ को काटकर खोखला करके बनाई डोंगी थी, बस आम डोंगियों से थोड़ी बड़ी थी।
हालाँकि दशकों में उसे लोहे की खान मिल चुकी थी, और ज़्यादा टिकाऊ न रहने वाले भुरभुरे लोहे के औज़ार बनाकर तीरों की पूर्ति कर ली थी, लेकिन नाव बनाने जैसे तकनीकी काम वह फिर भी नहीं कर पाता था।
यांग ज़िज़ांग ने मुड़कर उन आदिवासियों को देखा जो उसे प्रणाम कर रहे थे, इस छोटे क़बीले का विकास अपेक्षाकृत तेज़ था, इनकी सरल भाषा थी और बेलों से चीज़ें बाँधना जानते थे।
लेकिन ये सिर्फ़ दस-बीस लोग थे, यांग ज़िज़ांग का अंदाज़ा था कि शायद इन्होंने कहीं और से सीखा हो।
उसने इन दस-बीस लोगों के सामने ज़्यादा पेचीदा बेल-जाल बनाकर दिखाया, और उससे मछली और छोटे जानवर पकड़े, शायद कोई बाद में इसके और उपयोग खोज ले।
«भविष्य में मिलेंगे, आदिवासियों!»
«कुलागुला!»
आरी और कुल्हाड़ी कंधे पर रखे आदिवासी उदास मन से विदा कर रहे थे।
यांग ज़िज़ांग ने चमड़े की पाल खींचकर यहाँ से रवाना किया, वह समुद्र पार जाना चाहता था, और दूर की जगहें ढूँढ़ना चाहता था।
शायद समुद्र पर कोई नई खोज हो।
शायद निकलते ही दूर खड़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की कोई परित्यक्त मालवाहक नाव दिख जाए, उसने उम्मीद से सोचा।
«साठ साल हो गए, अब कुछ नया करने का वक़्त है! अब मैं हूँ: झेंग. मैगेलन कोलंबस. जैक-ज़ांग!»
युवक ने एक पाँव नाव के किनारे पर रखा, एक हाथ से धूप की टोपी पहनी, भले अपनी कारीगरी कैसी भी हो, लेकिन एक अलग अंदाज़ की खुरदुरी ख़ूबसूरती थी।
अगर फिर असफल हुआ, तो यह डाक चिह्न अपने लालची मालिक की वजह से बरबाद ही समझो।
अचानक, पीछे किनारे पर आदिवासी और ज़ोर से चिल्लाने लगे, और कई लोगों की आवाज़ों में डर भरा था।
यांग ज़िज़ांग हैरान होकर मुड़ा, उनकी नज़रों का पीछा करते सिर उठाकर देखा, तो आसमान में उल्का-सी चमक दिखी, बहुत दूर आकाश में सुई की नोक-सी लटकी।
«हो-हो, यह उल्का है, नहीं, धूमकेतु होना चाहिए।»
यांग ज़िज़ांग ने हँसते हुए कहा, ये आदिवासी कितने भोले हैं।
हालाँकि उन्हें दोष भी नहीं दे सकते, ऐसा धूमकेतु जिसकी पूँछ दिन में भी दिखे, बहुत कम देखने को मिलता है, अचानक आसमान में ऐसा अनोखा दृश्य, समझना सचमुच मुश्किल है।
उनका डरना भी स्वाभाविक ही है।
«यह सिर्फ़ स्वप्न है।»
कुछ दिनों बाद, चारों ओर असीम समुद्र देखते हुए, यांग ज़िज़ांग ने बुदबुदाया।
भले यह स्वप्न हो, लेकिन उसे लगता था कि वह अब इसी में जी रहा है।
एकमात्र इंसान।
नीला समुद्र, नीला आसमान, शुक्र है कि उसे भोजन और पानी की ज़रूरत नहीं थी, सोना भी नहीं पड़ता था, वरना शायद इस समुद्र पर सैकड़ों-हज़ारों बार मर चुका होता।
यांग ज़िज़ांग ने क्षितिज की ओर देखा। वह धूमकेतु अब भी आसमान में था, बस थोड़ी दूर बढ़ा था, पूरा आकाश पार करने में शायद अभी काफ़ी वक़्त लगे।
«पहले मैं समुद्र पार करूँगा, या पहले तुम आसमान पार करोगे?»
यांग ज़िज़ांग ने अपने मनोरंजन के लिए कहा।
दर्जनों दिन-रात बीतते गए, मौसम धीरे-धीरे ठंडा होता गया।
दोपहर, हलकी बर्फ़ रुकी ही थी, ऊबे हुए यांग ज़िज़ांग ने चपटी लंबी तलवार-नुमा लोहे की बर्छी से पानी में कुछ हरकत की, तभी अचानक दिल घबराने लगा, चारों ओर हवा में कुछ भयानी-सी गंध फैली थी।
त्योरी चढ़ाकर उसने किनारा बिखर चुकी घास की टोपी उतारी, इधर-उधर देखा, लेकिन कुछ ग़लत न पाया।
अचानक, बहुत ज़बरदस्त भयानक और डरावनी अनुभूति हुई।
«क्या चीज़ है?!»
डोंगी के किनारे पर, चपटी लोहे की बर्छी पर छायाएँ जमा होने लगीं, मानो उसमें से कुछ उभरने वाला हो।
बहुत पुरानी यादें लौट आईं।
इन्क्यूबस!
यांग ज़िज़ांग हैरानी से इस घटिया लोहे की बर्छी को देखने लगा, यह तो उसने ख़ुद बनाई थी, इसमें इन्क्यूबस क्यों पैदा होगा?
यह तो पृथ्वी का प्रक्षेप नहीं है।
«चीं!»
पत्थर की बर्छी और लकड़ी की छड़ी पर एक अजीब-सी आँख-जैसे निशान उभर आए, उसमें लाल बिंदु ऊपर-नीचे हिला, फिर यांग ज़िज़ांग पर टिक गया।
[मैं, महान चतुर्भुज, शत्रुता महसूस कर रहा हूँ।]
छाती पर Moxel अपने आप उभर आया।
ज़मीन पर पड़ी पत्थर की बर्छी साँप-जैसे छाया दानव में बदल गई, लाल आँखें साँप-बिच्छू जैसी, उसका शरीर मुड़ा, फिर झपट्टा मारा।
यांग ज़िज़ांग के हाथ पर पलक झपकते सुनहरी आभा चमकी, एक मुक्का जड़ दिया।
धम्म!
लोहे की बर्छी में अभी-अभी पैदा हुआ इन्क्यूबस पल भर में मर गया।
बर्छी पर अनगिनत अजीब निशान चमक रहे थे, गहरा लाल धुआँ सिकुड़कर हथियार के अंदर चला गया और नाव पर गिरकर शांत हो गया।
यांग ज़िज़ांग ने बर्छी उठाई, मन में कई विचार-ध्वनियाँ गूँजीं।
[सांसद इसे कहते हैं — आत्म-अस्त्र।]
आत्म-अस्त्र, Chronos अस्त्र नहीं?
यांग ज़िज़ांग की आँखें अचानक फैल गईं।
अभी-अभी उसे ख़त्म करने में कोई Chronos ख़र्च नहीं हुआ! एक सेकंड भी कम नहीं हुआ!
«उ-उ-उ…»
एक अजीब-सी कराहने की आवाज़ सपने-सी गूँजी, मानो कान में, मानो दिल में उठी हो।
पुरानी, और साथ ही हाल की-सी यादें लौटीं, ऐसी ही आवाज़… वह थी जब [जननी] ने उससे बात की थी।
और भी गहरी भयानक अनुभूति छा गई, यांग ज़िज़ांग ने इधर-उधर ढूँढ़ा, आख़िर नज़र उस चमड़े की पाल पर गई जो अभी खोली नहीं गई थी।
लंबे समय से समुद्र पर तैरते रहने के कारण, वह लगभग नमी से सड़ चुकी थी।
इस वक़्त पाल पर अनगिनत छायाएँ, जैसे नीली-काली नसें चमड़े और छोटे मस्तूल पर बह रही थीं, लगता था कोई चीज़ उसमें से पुनर्जीवित होने वाली है।
«एक और इन्क्यूबस? नहीं, दो!»
सुनहरी बर्छी घुसी।
धम्म! डोंगी पर अभी-अभी जमना शुरू हुआ धूसर कुहरा तुरंत हट गया, सुनहरे हथियार-सा गहरा लाल हथियार उसमें गहराई तक धँस गया।
यांग ज़िज़ांग इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा था, आख़िर यह क्या हो रहा है, अगर सिर्फ़ यहीं तक होता तो भी ठीक था, लेकिन…
ज़मीन पर!
वह आगे सोचने की हिम्मत नहीं कर पाया।
«यह स्वप्न है, यह सिर्फ़ स्वप्न है! फिर भी… आह! मरो!!»
उसने ग़ुस्से में सुनहरी चमक वाला मुक्का उठाकर मस्तूल पर मारा, लेकिन यह चीज़ न बहुत बड़ी थी न बहुत छोटी, सिर्फ़ Chronos में लिपटे मुक्के से इसके मुख्य भाग पर वार नहीं हो सकता था।
«फू-फू!»
धूसर कुहरे की दो किरणें आईं।
[समायोजन!]
धूसर कुहरे का प्रक्षेप पथ भी मोड़ा जा सकता था, वे समुद्र में गिरा दिए गए।
पानी के नीचे तैरती कुछ मछलियों पर वह धूसर कुहरा पड़ा, तो पल भर में दर्द से तड़पते हुए अपना रूप बदलने लगीं, ऑक्टोपस की तरह कई अतिरिक्त अंग उग आए।
अपना Chronos शायद ऐसे हमले से बचाव कर सकता था, लेकिन यांग ज़िज़ांग की खाल पर रोंगटे खड़े हो गए।
उसने विकृत बर्छी उखाड़ी और मस्तूल पर घुसेड़ दी, मस्तूल से भूतिया चीख़ निकली।
इस आवाज़ ने उलटे यांग ज़िज़ांग को थोड़ा शांत कर दिया।
«इस मौक़े पर और जानकारी जुटानी चाहिए।»
यह तो दशकों की खोज के बाद मिला अनोखा लक्षण था, बिल्कुल ऐसे ही सब मारकर ख़त्म नहीं कर सकता।
उसने डोंगी पर से एक लकड़ी का डंडा उठाकर पीटा।
इस आम डंडे से, पहले से गलने को तैयार चमड़े पर धम-धम की आवाज़ के अलावा, वाक़ई कुछ न हुआ।
«लगता है इन्क्यूबस की तरह ही, भले तुम उनसे थोड़े अलग हो, Chronos ख़र्च नहीं करना पड़ता, लेकिन आम हमले तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकते।»
फू-फू-फू!
फिर कई धूसर कुहरे की किरणें आईं, हमेशा की तरह पानी में मोड़ दिए जाने के बाद, यांग ज़िज़ांग ने हाथ के आत्म-अस्त्र से कुछ ही वार में उसे पूरी तरह कुचल डाला।
सिर्फ़ लकड़ी का ठूँठ बचे मस्तूल पर, काले निशान धीरे-धीरे बहना बंद हो गए।
नीला-लाल चिपचिपा रिसाव निकला, सूखने पर, जैसे पारदर्शी झिल्ली-सी सतह पर जम गया।
यांग ज़िज़ांग ने हाथ से छुआ।
[शायद छोटी नाव की गति बढ़ाने वाला आत्म-अस्त्र है।]
कुछ देर और इंतज़ार किया, डोंगी पर और किसी चीज़ में कोई विकृति नहीं आई।
«अचानक ये चीज़ें क्यों निकल आईं, क्या किसी ख़ास जगह में आ गया हूँ?»
आगे का समुद्र पहले से अलग न था, सिवाय इसके कि शायद सर्दियों की वजह से, कभी-कभार बर्फ़ के फाहे गिर जाते थे।
यांग ज़िज़ांग ने सिर उठाकर मस्तूल को देखा, छूने पर सचमुच महसूस हुआ कि इससे नाव की गति बढ़ सकती है।
फिर उसकी नज़र और ऊपर गई।
अगर और कोई ख़ासियत थी — तो वह था आसमान का वह धूमकेतु, जो दो-तीन महीने दौड़ने के बाद अब सुबह के सूरज-सा ऊपर आ गया था।
«कहीं तुम्हीं तो नहीं?!»
यांग ज़िज़ांग ने सिर उठाया, अगर सचमुच ऐसा है, तो वह ज़मीन शायद…
नाव का रुख़ मोड़ा!
[आत्म-अस्त्र, गति बढ़ाओ!]
[समायोजन, गति बढ़ाओ!]
धम्म!
डोंगी की रफ़्तार पल भर में बढ़ गई।
नाव के अगले हिस्से पर पाँव रखे खड़े यांग ज़िज़ांग का दिल बेचैन था।
वह बार-बार सिर उठाकर उस धूमकेतु को देखता, जो अब थोड़ा बड़ा होकर अपनी सतह की लाली दिखाने लगा था।
[यह गति और खपत बनाए रखते हुए, समय, त्वरित करो!]
[मैं 7.1R बाद पहुँचा।]
एक सेकंड में कई बार दिन-रात बदले, यांग ज़िज़ांग ने पाया कि रफ़्तार काफ़ी घट गई, मस्तूल की गति-वृद्धि क्षमता ख़त्म हो गई।
इसकी ऊर्जा का स्रोत Chronos नहीं था।
«तेरी ख़ुराक क्या है?»
मरा हुआ इन्क्यूबस बोलता नहीं, यांग ज़िज़ांग को अचानक तरकीब सूझी, झुककर लहरों के नीचे हाथ डाला, पास तैरती मछलियाँ जैसे ख़ुद-ब-ख़ुद हथेली में आ गईं, उसने पकड़ लिया।
मछली मस्तूल वाले आत्म-अस्त्र को छूते ही, उसमें से कुछ धागे-से निकलकर मछली के शरीर में घुस गए, उसकी हरकत धीमी हुई, फिर तेज़ी से सूख गई।
«एक मछली बिल्कुल काफ़ी नहीं।»
यांग ज़िज़ांग ने पानी के नीचे देखा, अँधेरे समुद्र के नीचे से कोई विशाल जीव गुज़रता दिखा।
स्केल-कवच वाली शार्क-सी चीज़ मुड़कर झपटी, डोंगी से कुछ मीटर दूर पानी से उछली, सीधी नाव पर आ गिरी, आँखें तनी यांग ज़िज़ांग ने दो बर्छियों से उसकी जान ले ली।
ख़ून की गंध फैली, यांग ज़िज़ांग ने उसे मस्तूल के पास लिटाया, थोड़ी ही देर में सूखी बड़ी मछली बन गई।
मस्तूल ने फिर गति बढ़ानी शुरू की।
«गुज़ारिश है, स्वप्न ही सही…»
एक महीने बाद, समुद्र-तट आख़िर नज़र आया, उसे देखते ही, यांग ज़िज़ांग बेचैनी से उठ खड़ा हुआ, वहाँ देखने लगा।
डोंगी जैसे स्पीडबोट सर-से अजनबी तट की रेत पर चढ़ गई।
[समय त्वरण।]
[मैं 2R बाद पहुँचा।]
सूरज-चाँद घूमे, यांग ज़िज़ांग जाते वक़्त वाली उस आदिम बस्ती के पास आया, इस वक़्त यहाँ कोई इंसानी बस्ती न थी।
लेकिन, ख़ून की गहरी गंध जैसे यहाँ हमेशा के लिए बस गई थी।
गहरे और घने जंगल के किनारे, पहले रहने वाली गुफ़ा में, धुँधली लाल रोशनी झिलमिला रही थी।
ग़ुस्से से पागल!
यांग ज़िज़ांग इतना कभी दुखी और ग़ुस्से में न था।
उसने हाथ में बर्छी पकड़ी, शरीर पर Moxel की चार गुना बढ़ी सुनहरी चमक के साथ क़दम-दर-क़दम वहाँ बढ़ा। अभी पास भी न पहुँचा था कि अंदर के इन्क्यूबस ने बाहर की ज़िंदगी भाँप ली।
धड़ाम!
चट्टान फटी, तलवार-मछली-जैसी, उँगली-भर बड़े अजीब इंसानी चेहरों वाली कई चीज़ें चट्टान पार करके आईं।
«आह, मर!»
यांग ज़िज़ांग क्या नहीं जानता था कि ये चेहरे कहाँ से आए!
हथियार चला, ये चीज़ें ज़मीन पर होतीं तो शायद कुछ और बात थी, हवा में उड़ने के कारण समायोजन क्षमता के शिकार हो गईं, जैसे ख़ुद ही बर्छी की नोक से टकरा रही हों।
बर्छी की छाया हवा-सी।
इस विशाल आदिम महाद्वीप पर कम-से-कम दस-बीस साल युद्ध-कौशल अभ्यास कर चुका यांग ज़िज़ांग, अब पहले जैसा आम आदमी न था।
ये छोटे इन्क्यूबस दानव जल्दी ही गिरकर तरह-तरह के छोटे चाकू, पत्थर की कुल्हाड़ियों में बदल गए।
वह दिल से टूट गया, बहुत पछतावा हुआ।
गहरी ख़ूनी आभा उठी।
{गूरा-ऽ…}
गुफ़ा से, इंसानी आकार का, लेकिन सारा शरीर बेलों से बना इन्क्यूबस दानव निकला।
उसने एक विकृत बंदर-इंसानी चेहरा लगा रखा था, बाहर लाल आँखों वाले यांग ज़िज़ांग को देख रहा था।
उस जाने-पहचाने लेकिन विकृत चेहरे को देखकर, यांग ज़िज़ांग ख़ुद को रोक न सका!
«आह! मर!»
सर-सर!
उसकी उँगलियों से कई बेलें तेज़ी से फैलीं, बड़ा जाल बनकर बिखर गईं।
उनके गिरने से पहले ही, दो थोड़ी छोटी ऐसी ही अजीब चीज़ें उसके पीछे प्रकट हुईं, उसी तरह की क्षमता से बेल-जाल फेंका।
यांग ज़िज़ांग पल भर में छाया बन गया, बर्छी ने बेल-जाल उठाकर सर-से फाड़ डाला।
धुँधली धूप घने पत्तों को चीरकर धब्बेदार रोशनी बिखेर रही थी, इन्क्यूबस दानव के पाँवों की जड़ें मज़बूत नसों-सी ज़मीन में गहरी धँसी थीं।
{ऊ-गूरा!}
वे आदिवासियों की तरह दहाड़े, एक-एक करके बड़ी-बड़ी बेलें ज़मीन चीरकर उठ खड़ी हुईं, जैसे रेंगते विशालकाय अजगर।
यांग ज़िज़ांग फुर्तीले शरीर से उछल-कूदकर ज़मीन के नीचे रेंगती जड़ों से बचता रहा।
एक धीमी दहाड़ के साथ, दोनों छोटे बेल-इन्क्यूबस ने गूँथी हुई विशाल भुजाएँ घुमाईं, सनसनाती हवा की आवाज़ के साथ दे मारीं।
धम्म!
दोनों बेल-भुजाओं ने रास्ता बदला, ज़ोर से आपस में टकराईं, आसमान में रेशे उड़ गए।
उसका शरीर लहराया, फुर्ती से किनारे जा पहुँचा, साथ ही हाथ की बर्छी रोशनी की लकीर बनकर निकली, सीधी पेड़-दानव की छाती में जा धँसी।
«गति बढ़ाओ! इसे तोड़कर घुसाओ!»
बर्छी की रफ़्तार बेतहाशा बढ़ी!
छोटे इन्क्यूबस की ज़्यादा मज़बूत न रहने वाली छाती पल भर में फट गई, अंदर की लाल चमक बर्छी की नोक से छिदकर बिखर गई।
बाक़ी दो इन्क्यूबस यह देखकर दहाड़ते हुए झपटे।
उन्हें भी आख़िर समझ आया कि सामने वाला पिछले दिनों के कमज़ोर प्राणियों जैसा नहीं, और पूरी ताक़त लगाने लगे।
ज़मीन के नीचे की जड़ें धड़ाधड़ बाहर उखड़ीं, लहराते भालों-सी यांग ज़िज़ांग पर झपटीं।
टप-टप-टप!
यांग ज़िज़ांग ने कई बार फुर्ती से पाँव रखे, एक उभरी जड़ पर पाँव धरकर उछल पड़ा।
दूसरे छोटे इन्क्यूबस ने तेज़ी से अपनी ऊर्जा ख़र्च की, शरीर लहराया, अनगिनत महीन बेलें शरीर से निकलकर आसमान छूती लहरों-सी उमड़ पड़ीं, तेज़ी से पास आते दुश्मन को उलझाना चाहा।
यांग ज़िज़ांग ने सारे शरीर पर सुनहरी चमक लिए, एक मुक्के में सामने की अनगिनत महीन बेलें तोड़ डालीं।
शरीर गुफ़ा के सामने जा पहुँचा, उसने इन्क्यूबस के शरीर में धँसे आत्म-अस्त्र को पकड़कर एक झटके में खींच लिया।
«वापस नर्क में जा!»
बर्छी की छड़ ने लपकती बेलों को झटककर हटाया, धड़ाम से दूसरे छोटे इन्क्यूबस के उस हिस्से में घुस गई जहाँ बेलों का घेरा देर से पहुँचा था।
धम्म!
लाल ऊर्जा-गोला फूटा।
पीछे से अनगिनत विशाल बेलें सनसनाती आ पहुँचीं।
यांग ज़िज़ांग ने सिर घुमाकर देखा, हाथ अपने-आप चल पड़ा।
धम-धम-धम!
बर्छी की नोक चमक उठी, उसका शरीर धनुष से छूटे तीर-सा हो गया, गहरा लाल आत्म-अस्त्र चमकदार भ्रम-रेखा बन गया।
कानफोड़ू गर्जन के साथ, बचे विशाल इन्क्यूबस ने दर्द-भरी भूतिया चीख़ निकाली।
बर्छी ठीक उसके शरीर के लाल ऊर्जा-गोले में जा धँसी।
धड़ाम!
धब्बेदार धूप में, आख़िरी इन्क्यूबस भी धीरे-धीरे बिखरने लगा।
आसमान छूते टुकड़ों के बीच, यांग ज़िज़ांग उठा और बेरुख़ी से सिर घुमाकर देखा, चारों ओर बयान से परे दानवों के अवशेष बिखरे थे।
वह चुपचाप गुफ़ा में दाख़िल हुआ, चारों ओर दस-बीस सूखी इंसानी आकृतियाँ बिखरी थीं।
दीवार पर शरारती बच्चों की पत्थर से बनाई बेतरतीब रेखाएँ थीं, ऊपर, क़बीले के रसूख़दार आदिवासियों की मेहनत से बनाई तरह-तरह की जीव-आकृतियाँ थीं।
एक मेहराब, चार छोटी रेखाओं से बना जानवर, खड़ी क्रॉस रेखाओं से बना इंसान, और दो मुड़ी रेखाओं से बनी कई मछलियाँ।
«तुम लोग मछली भी पकड़ने लगे थे।»
«इतनी मेहनत से जीने वाले लोग…»
यांग ज़िज़ांग ने मुट्ठी भींच ली, इन तस्वीरों के नीचे, दीवार के कोने में ख़ून चुसी लाशों को देखा।
«अभी मातम का वक़्त नहीं।»
यह महाद्वीप अभी बहुत बड़ा है।
अगर विकृति इसी छोर से शुरू हुई है, तो वक़्त के हिसाब से, शायद अभी पूरे महाद्वीप पर न फैली हो।
वह तेज़ी से उन क़बीलों और छोटी बस्तियों की ओर बढ़ा जहाँ उसने अपनी कला और हथियार छोड़े थे।
कई महीनों में धूमकेतु आधा आसमान पार कर चुका था, अब बसंत आए काफ़ी दिन हो गए थे।
रास्ते भर यांग ज़िज़ांग एक के बाद एक तबाह बस्तियों से गुज़रा, बस चंद बेबस आदिवासी जान बचाकर निकल भागे थे, जो अब कभी घर लौटने की हिम्मत न कर सके।
वे अकेले असीम धरती पर बिखरे थे, न जाने कब अपने जैसे क़िस्मत वालों से मिलकर नई बस्ती बना पाएँ।
धम!
लकड़ी के छप्पर से बने इन्क्यूबस को कुछ ही बर्छियों में तोड़ डाला।
तपती धूप में, आधे से ज़्यादा महाद्वीप पार करके यांग ज़िज़ांग चलता आ रहा था।
टूटी लकड़ी उठाकर सिर झुकाकर देखा, झोंपड़ी के नीचे की लाशों के अवशेष ऐसे लग रहे थे जैसे आधे महीने से कम पहले मरे हों।
«यह इन्क्यूबस शायद अभी-अभी बना है, मेरा अनुमान सही है।»
आसमान में धूमकेतु बेदाग़ नीले आकाश में टँगा था, जैसे चित्रकार की ख़ूबसूरत तूलिका का स्पर्श हो।
उसने आसमान से नज़रें हटाईं, अभी जाने को था कि दूर से कई आवाज़ें सुनाई दीं।
एक बड़ा और एक छोटा, दो आदिवासी बाहर निकल आए, वे दस-बीस मीटर दूर बंदरों-से उकड़ू बैठे ऊँ-ऊँ करते यांग ज़िज़ांग को देख रहे थे।
«माफ़ करना, इस बार मैं… तुम्हें कुछ नहीं सिखा सकता।»
वह वहीं ग़ायब हो गया।
धूमकेतु स्थिर गति से आगे बढ़ता रहा, आधे से ज़्यादा आसमान पार करने पर, यांग ज़िज़ांग महाद्वीप के दूसरे छोर पर लौट आया।
आख़िरकार एक के बाद एक कुछ बची हुई छोटी बस्तियाँ मिलीं, उन्होंने या तो यांग ज़िज़ांग की सिखाई तकनीकें भुला दी थीं, या वे पत्थर की बर्छियाँ-चाकू टूट चुके थे, या पहले कभी उससे मिले ही न थे।
पीले पड़ते जंगल के पास, यांग ज़िज़ांग ने नए सिरे से पत्थर की बर्छी और पेचीदा छोटी लकड़ी की झोंपड़ी बनाई, कोई इन्क्यूबस पैदा न हुआ।
इसके बाद उसने सिर के ऊपर अपने से एक क़दम पीछे चलते धूमकेतु को देखा।
उसे यक़ीन हो चुका था, कम-से-कम नब्बे प्रतिशत संभावना है कि ये सब विकृतियाँ उसी से आई हैं।
«यही है, जो यह दुनिया मुझे बताना चाहती थी?»
झोंपड़ी के बाहर बैठकर दो दिन इंतज़ार किया, कोई विकृति न दिखी, तो यांग ज़िज़ांग ने आग लगाकर उसे जलाकर राख कर दिया।
……
शामन अलाव के सामने बैठे थे।
धुँधली आँखों वाले बूढ़े के चारों ओर अनगिनत सीधी-सादी नज़रों, लेकिन चमकती आँखों वाले लोग बैठे थे।
चाहे मर्द हों या औरतें, बूढ़े हों या बच्चे, सबने साफ़-सुथरे तरह-तरह के चमड़े के कपड़े पहन रखे थे।
बर्फ़ीला तूफ़ान चल रहा था। इस चट्टानी खाई के नीचे बीच-बीच में हँसी-ख़ुशी की आवाज़ें आतीं, लेकिन ये लोग बूढ़े शामन के पास ज़ोर से बोलने की हिम्मत न करते, बस कभी-कभी भीड़ के किनारे धीमे-धीमे हँसी-मज़ाक़ कर लेते।
अगर कोई इस बूढ़े को परेशान करता, तो कई क़बीले के मुखिया तुरंत उसकी रस्सी-कमरबंद खोलकर, चमड़े के कपड़े उतारकर, उसे बर्फ़ीले तूफ़ान में फेंक देते।
क्योंकि शामन न होते, तो ये लोग इतने आराम से दिन कहाँ गुज़ार पाते, बस बर्फ़ीली हवा में भूखे-ठिठुरते, मुश्किल से सर्दियाँ काटते।
इतनी सख़्ती से नौजवानों को सज़ा इसलिए दी जाती थी क्योंकि बूढ़े की उम्र बहुत ज़्यादा थी, अब कोई झटका बरदाश्त नहीं कर सकते थे।
उस ज़माने से ज़िंदा बचे लोगों में, बस चंद ही रह गए थे।
लेकिन इन चंद लोगों को कम मत समझो, इनकी ज़िंदगी आम आदिवासियों से दुगनी से भी ज़्यादा थी, क्योंकि ज़्यादातर आदिवासी तीस साल भी नहीं जी पाते थे। वे अकसर बीमारी, भूख और जंगली जानवरों का शिकार होते थे।
एक साफ़ माथे वाले आदमी ने पास की लड़की से धीरे से कुछ कहा, लंबे बाल और गोल चेहरे वाली आदिवासी औरत ने उसे घूरा, फिर दबे पाँव उठकर बाहर चली गई।
आदिवासी मर्द ही-ही करके हँसा, फिर चोरी-चोरी पीछे हटकर, विशाल धधकते अलाव के दायरे से बाहर निकल गया।
दोनों बस्ती के मुखियाओं ने एक-दूसरे को देखा, जानी-पहचानी मुस्कान बदली।