अचानक भीड़ में हलचल हुई और सब अलाव की ओर देखने लगे।
कई मुखिया घबराकर उकड़ू बैठे-बैठे रेंगते आए, फिर राहत की साँस ली।
पता चला कि शामन ज़मीन पर बैठे-बैठे गिरते-गिरते बचे, तुरंत रीढ़ सीधी करके संभल गए।
शामन के पास बैठे एक अधेड़ आदमी ने उन्हें सहारा देकर स्थिर किया, फिर अचानक आँसू बह निकले। वह कभी यहाँ का सबसे ताक़तवर आदमी था, मगर बिना क़दम हिलाए इस बूढ़े की एक दशक से भी ज़्यादा रखवाली करता रहा।
अब वह जो कभी बस्ती का सबसे ताक़तवर नौजवान था, ख़ुद भी अधेड़ हो गया था।
वह जानता था कि यह बूढ़ा बहुत देर से शारीरिक और मानसिक पीड़ा सह रहा है, मगर हमेशा ज़बरदस्त इच्छाशक्ति से इस जर्जर शरीर को खींच रहा है, जैसे इसकी आख़िरी बूँद जीवन-रस तक निचोड़ लेना चाहता हो, तब जाकर चैन से जा सके।
जब भी बूढ़े के गले से दबी कराह सुनता या उसके बेक़ाबू काँपते हाथ-पाँव देखता, उसे वैसी ही तकलीफ़ महसूस होती।
शामन ने ढीली पड़ चुकी सूखी खाल वाला सिर घुमाया, बड़ी मुश्किल से हथेली उठाई, अधेड़ आदिवासी ने तुरंत झुककर सिर नीचे कर लिया, बूढ़े को अपना सिर थपथपाने दिया।
आसपास काफ़ी हद तक जंगलीपन खो चुके आदिवासियों की आँखों में ईर्ष्या उभर आई।
दो-तीन मीटर ऊँची आग की लपटें भव्य और शक्तिशाली थीं।
अनंत काल से न जाने कितनी जानें लेने वाला सफ़ेद बर्फ़ीला शैतान भी इसे देखकर रास्ता बदल लेता, वरना भस्म हो जाता — यही शामन की दैवी शक्ति थी।
यह बस्ती की रखवाली करती थी।
जब भी आग ज़रा कम होती, कोई-न-कोई उसमें लकड़ी डाल देता, यह शामन की सीख थी।
उसके पास की गर्म राख के नीचे, शकरकंद जैसे कई फल दबे रहते थे।
दशकों से, इन्होंने इस इलाके के हज़ारों लोगों का पेट भरा था, अनगिनत मुखिया पहाड़-दरिया पार कर, बाघ के मुँह में जान देने का जोखिम उठाकर अपने क़बीले वालों को ले आते थे, बस पेट भरने का ऐसा एक निवाला खाने को।
दयालु शामन कभी कंजूसी न करते, सब आने वालों में बाँट देते।
बूढ़े ने हाथ वापस लिया, फिर से सिर घुमाया, आधी बंद पलकों के साथ अलाव के सामने बैठ गए, जैसे कोई ध्यानमग्न तपस्वी हों।
न जाने कितनी देर बाद, उन्हें एक धुँधली-सी आवाज़ सुनाई दी।
«श्याओ वू?»
आसपास सैकड़ों आदिवासियों की «ऊ-ओ» «हू-ओ» की आवाज़ें गूँज उठीं।
पहले से बहुत सुस्त हो चुके बूढ़े ने मुश्किल से धुँधली आँखें खोलकर देखा, दूर एक बहुत पतले मगर चटकीले रंग के कपड़े पहने आकृति नज़र आई।
दरअसल वह उस आकृति को अब देख नहीं सकते थे।
लेकिन जैसे ही वह शख़्स सामने आया, अनगिनत सालों की याद में करोड़ों बार सोची गई तस्वीर उस पर छा गई।
«आह!»
बूढ़ा चीख़ उठा, और अकेले ही काँपते हुए खड़ा हो गया।
सैकड़ों आदिवासी उठ खड़े हुए, शत्रुता भरी नज़रों से दूर खड़े यांग ज़िज़ांग को देखने लगे।
«हा-आह!»
उसने अपनी सूखी मगर मज़बूत हथेली हिलाई।
इस पल बूढ़ा मानो जवानी में लौट आया, आँखों में तेज़ चमक भर आई, पूरे शरीर से गंभीर और प्रतापी आभा फैलने लगी।
हज़ारों लोग ‘हा’ करके अधबैठे हो गए, हिलने की हिम्मत न हुई, चोरी-चोरी हैरान नज़रों से बूढ़े को देखने लगे।
यह देखकर यांग ज़िज़ांग का दिल भी काँप गया।
बूढ़े ने पास के सेवक से लंबा डंडा लिया, ज़मीन पर टेका, क़दम बढ़ाने को तैयार हुए।
«रुको-रुको-रुको।»
यांग ज़िज़ांग ने हाथ हिलाया।
ये कुछ ध्वनियाँ बूढ़े के कानों में पड़ीं, तो अचानक उसे कुछ समझ आ गया, ‘हा-या’ करके, मानो दुनिया की सबसे मुश्किल पहेली सुलझा ली हो, ज्ञान-प्राप्ति-सा गहरा आनंद दिल से उमड़ पड़ा।
तो उस साल वह ध्वनि, इसी मतलब की थी।
जब पत्थर गिरने से पहले जो ध्वनि निकाली थी, उसका मतलब था ‘हिलना मत’।
यांग ज़िज़ांग ख़ुद-ब-ख़ुद रास्ता छोड़ती भीड़ के बीच से आगे बढ़ा।
अलाव तक पहुँचकर उसने आसमान छूती लाल लपटों को सिर उठाकर देखा, दिल से बहुत ख़ुश हुआ।
«ऊ-ओ, ओह!»
बूढ़े आ वू ने राख से सनी, मगर अब भी भाप छोड़ती एक चीज़ बढ़ाई।
हथेली फैलाकर आग तापते यांग ज़िज़ांग ने हँसते हुए यह «प्राचीन शकरकंद» लेकर सूँघा।
«बहुत अच्छा है।»
उसने उँगली से ज़रा-सा चुरा लेकर चखा।
«म्म! स्वादिष्ट, हमारा श्याओ वू तो बावरची बन गया।»
उसने अँगूठा दिखाया, आ वू हा-हा करके हँस पड़ा।
आसपास हज़ारों आदिवासियों ने शामन को कभी इतने दिल से ख़ुश होते नहीं देखा था।
फिर वे हैरत से देखने लगे कि बूढ़ा उकड़ू बैठकर, अपना सिर यांग ज़िज़ांग के पास ले आया।
युवक ठिठका, फिर याद आया कि जब पहली बार मिला था, तो कई बार उसका सिर थपथपाया था।
वह तो बस यूँ ही एक बेध्यानी का इशारा था।
«आह, वक़्त सबसे बड़ा…»
उसने हलके से बूढ़े के लगभग गंजे सिर पर थपकी दी।
सिर पर वह ठोस-भरोसे का स्पर्श पाकर, आ वू को जैसे आख़िरी इच्छा पूरी हो गई, शरीर की ताक़त अचानक बहुत कमज़ोर पड़ गई, खाँसी का दौरा उठा।
«जल्दी आराम करो।» यांग ज़िज़ांग ने उसे गोद में उठाकर कुछ क़दम पीछे चमड़े के बिस्तर पर लिटा दिया, आसपास के आदिवासी ख़ुद-ब-ख़ुद हट गए।
कुछ वे क़बीले वाले जिन्होंने पहले भी यांग ज़िज़ांग को देखा था, पहले ही ज़मीन पर लेट चुके थे, इससे हज़ारों आदिवासी समझ गए कि इस शख़्स का दर्जा आम नहीं है।
यांग ज़िज़ांग एक-एक करके उठाने लगा, लेकिन बूढ़े ने कलाई ज़ोर से पकड़ ली।
कमज़ोर हालत में उसने जेब से दो छोटे काले पत्थर निकाले, हथेली खोलकर उस शख़्स को दिए जो दशकों में ज़रा भी बूढ़ा नहीं हुआ था।
आ वू ने अब यह सोचना छोड़ दिया था कि ऐसा क्यों है, बस इतना मान लिया कि इस शख़्स के साथ जो भी हो, सब सामान्य है।
यांग ज़िज़ांग ने सिर हिलाया, हाथ से उसकी सूखी उँगलियाँ मोड़कर अग्नि-पत्थर पर बंद कर दीं, मुट्ठी बना दी।
«ख़ुद ही कोई उत्तराधिकारी चुन लो।»
उसने बूढ़े की मुट्ठी की ओर इशारा किया, फिर उँगली से पास ही उकड़ू बैठे आदिवासियों की ओर संकेत किया।
आ वू ने मुस्कुराकर सिर हिलाया, दिल में असीम ख़ुशी भर आई।
आख़िरकार उसने उस शख़्स का इंतज़ार कर लिया, और उसके दिमाग़ में थोड़ी रोशनी हुई:
——वह ज़रूर जानता था कि मैं इतनी देर टिक सकता हूँ, इसलिए आख़िरी पल से पहले आया है, वह मुझे जीते रहने की हिम्मत दे रहा है।
आ वू ने आख़िरी बार अलाव की ओर देखा, चिनगारियाँ घूमती-उड़ती आसमान की ओर गईं।
चौड़ी पहाड़ी गुफ़ा के ऊपर ऊँची चट्टान थी, देखने में यह सुरक्षित जगह नहीं लगती थी, मगर हैरत की बात कि इतने सालों में कोई ढीला पत्थर गिरकर नीचे बिखरे बालों और चमड़े के कपड़े पहने आदिवासियों को चोट नहीं पहुँचा।
यांग ज़िज़ांग पहाड़ की चोटी पर पालथी मारे बैठा था, गहरा लाल आत्म-अस्त्र जाँघों पर रखा हुआ।
वह सामने से सधी चाल से आते धूमकेतु की प्रतीक्षा कर रहा था।
क्षितिज का चमकता बिंदु, धूसर-नीली पूँछ लिए।
उसके क़दम स्थिर, नीले आकाश को पार करते। मानो कोई एकाकी सम्राट धीर-गंभीर चाल से आगे बढ़ रहा हो।
इत्मीनान से नीले गगन को चीरता हुआ।
बर्फ़ रुकी फिर गिरी, हवा थमी फिर चली।
उस दिन, यांग ज़िज़ांग ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं, पहाड़ के नीचे से कोई गहरी भयानक आभा पनपती महसूस हुई।
धूमकेतु सिर के ऊपर से प्रताप से चलता आ रहा था।
«आ गया।»
वह खड़ा हुआ, जेब से छोटे चाकू-जैसा आत्म-अस्त्र निकाला।
{बहुत पहले, कोई तुम्हारी ही स्थिति में था, और उसने वही चुनाव किया।}
अचानक, यांग ज़िज़ांग को कोई मृगतृष्णा-सी दिखी।
[मैं और नाड़ी-संयोजक असना 50% से ज़्यादा मानसिक प्रतिध्वनि तक पहुँचे।]
«यह क्या है?»
यांग ज़िज़ांग स्वप्नवत उसी जगह खड़ा रहा, इस वक़्त पहाड़ की चोटी वह नहीं थी जहाँ पहले था, बल्कि अनजानी, मगर कुछ मिलती-सी ऊँची चट्टान थी।
एक सीधी-तनी आकृति पीठ पर विशाल तलवार लादे सामने खड़ी थी, उसे देखते ही यांग ज़िज़ांग जान गया कि यही असना है।
यहीं खड़े रहकर भी, यांग ज़िज़ांग ने इस आकृति के ज़रिए उसके अतीत के टुकड़े-टुकड़े अनुभव देख लिए:
सभ्यता जहाँ सूखी घास की तरह मुरझा चुकी थी, ऐसी बंजर ज़मीन पर, असना नाम का यह आदमी अकेला कुछ ऐसी बस्तियों से गुज़रा जहाँ इंसानी छवि अब भी बची थी, और वहाँ पहले से आदिम समाज जैसे हो चुके घुमंतुओं को पेट भरने और तन ढकने की कलाएँ सिखाता गया।
इस पल, अपनी ही तरह, वह भी पहाड़ की चोटी पर खड़ा था, नीचे अपने सिखाए आग के इस्तेमाल वाली घुमंतू बस्ती में, किसी शक्तिशाली इन्क्यूबस के पैदा होने का इंतज़ार कर रहा था।
«यह सच है…»
यांग ज़िज़ांग दंग रहकर उसे विशाल तलवार खींचते, फिर छलाँग लगाते देखता रहा।
मृगतृष्णा ग़ायब हो गई।
नीचे, हज़ारों आदिवासी असमंजस में सामने उस चीज़ को देख रहे थे जिसने दशकों तक उनकी रक्षा की थी — «आग»।
इस वक़्त वह मानो ज़िंदा हो गई थी।
उससे निकलती आभा दिल दहला देती थी, भाग जाने का जी करता था, फिर भी सबने डर को दबाकर उसके सामने सिर झुका दिया।
क्या शामन के जाने से, दैवी शक्ति बेक़ाबू हो गई?
या शामन आग में समा गए, और उसमें जाग उठे?
आदिवासियों के मन में तरह-तरह के ख़याल दौड़े, वे समझ नहीं पा रहे थे कि आख़िर हुआ क्या है, मगर यह ज़रूर शामन से जुड़ा है।
कुछ लोग मदद की गुहार-सी करते चट्टान की चोटी की ओर सिर घुमाने लगे।
यांग ज़िज़ांग के दिल में जोश भर आया, वह इसलिए यहाँ खड़ा हो सका क्योंकि चाहे जो हो जाए, वह सचमुच कभी नहीं मरेगा।
लेकिन अभी-अभी की वह आकृति, उसकी दुनिया तो कोई स्वप्न नहीं थी, फिर भी वह बिना हिचकिचाए कूद पड़ा था।
«असना… सचमुच एक महानायक-सा शख़्स था।»
विशाल अलाव से आग की लपटों की अनगिनत महीन रेखाएँ बनती गईं, इतने सारे आदिवासियों के जमावड़े के बीच, अंदर की चीज़ तेज़ी से जन्म ले रही थी, एक धुँधली आँख उग आई।
आग की आँख ने चारों ओर नज़र दौड़ाई, सबसे पहले उसकी नज़र में फँसे हुए जंगली जानवर आए।
अभी बहुत कम बुद्धि वाली उस चीज़ ने सबसे पहले पास का खाना जुटाने की सोची।
सर-सर!
ज़मीन पर आग की कई लकीरें खिंच गईं, यांग ज़िज़ांग द्वारा पकड़कर लाए गए बाघों और भेड़ियों की ओर लपकीं।
दर्द भरी चीख़ों में, जानवर तेज़ी से सूखने लगे।
सैकड़ों आदिवासी ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे, बहुत डर गए, लेकिन कुछ मुखियाओं के चिल्लाने पर, भागने की कोशिश करते लोग रुक गए।
यांग ज़िज़ांग ऊपर से चुपचाप सब देखता रहा, वह इंतज़ार कर रहा था कि आग इन आदिवासियों पर हमला करे, तभी ये सीखेंगे कि इन्क्यूबस कितना भयानक होता है।
धड़-धड़-धड़!
कानफोड़ू गर्जन, अलाव अचानक फैल गया, भेड़िए और बाघ के सिर वाले कई दैत्याकार अंदर से चमकते हुए उभरे, मानो चार-पाँच सिर और दर्जन भर आग के पाँवों वाली विकृत आकृतियाँ हों।
जन्म लेते ही, कई छोटे आग-बाघ लपटों से निकलकर चारों ओर लोगों की तरफ़ झपटे।
सन-सन-सन-सन!
ऊँचाई से तेज़ किरणें तेज़ी से गिरीं, विनाशकारी आभा के साथ उन्हें चौड़ी ज़मीन पर जड़ दिया, रेंगती छाया-बाघ-भेड़िए अब ज़रा भी न हिल सके।
आदिवासियों को आख़िर समझ आया कि यह शामन का पुनर्जन्म नहीं है, पल भर में अफ़रा-तफ़री मच गई।
बीच का विकृत कई-सिरों वाला इन्क्यूबस ग़ुस्से से सिर उठाकर खड़ा हुआ, चट्टान की चोटी पर खड़ी आकृति को निशाना बनाया।
«हूँ-ऽ-ऽ…»
ज़मीन झुलसकर ज़ोर से जलने लगी, वह तेज़ी से शक्ति बटोर रहा था, कई सिर और हाथ-पाँव आपस में जुड़ गए, और ज़्यादा ऊँचे हो चुके अलाव से अब पूरी तरह जन्म लेने वाला था।
«तुम अपना इतिहास मुझे बताने के लिए, शुक्रिया।»
ऊपर आसमान से देव-तुल्य शांत आवाज़ आई, फिर एक दहाड़ के साथ, यांग ज़िज़ांग की वह छरहरी आकृति सुनहरी चमक के साथ ज़ोर से नीचे झपटी!
«अब, मरो!»
गिरते हुए, यांग ज़िज़ांग को लगा जैसे उसके शरीर पर किसी और की छाया पड़ गई हो।
[मैं और नाड़ी-संयोजक असना 85% से ज़्यादा मानसिक प्रतिध्वनि तक पहुँचे।]
[मैं नाड़ी-संयोजक असना के साथ चल रहा हूँ।]